"बंधन"....किसी भी रिश्ते में यदि इंसान बंध जाए या बंधा हुआ महसूस करने लगे उस रिश्ते पर वही पूर्ण विराम लग जाता है।
फिर चाहे वो "शादी" बंधन हो , प्रेम का बंधन हो या दोस्ती का।
किसी को भी बंधना मंजूर नहीं, एक अजीब सी छटपटाहट होने लगती है,कभी महसूस करके देखिए,दो प्रेमी युगल जो हाथ थामकर बैठे है और सुकून का अनुभव कर रहे है,यदि उनके उन हाथों को बांध दिया जाए तो कुछ ही देर में वो बेचैन हो जाएंगे,ऐसा क्यो हुआ??हाथ वही है साथ वही है ,फिर सुकूँ की जगह बेचैनी क्यों???
जी हां वजह है बंधन,जब तक उनके हाथ आज़ाद थे ,वो जब चाहे थाम और छोड़ सकते थे तब तक वो सुकूँ दे रहे थे,पर बंधन आते ही भाव बदल गए,सुकूँ गायब हो गया उसकी जगह गयी बेचैनी,शादी से पहले जो प्रेयसी दिल को भाती थी हर घड़ी जिसके साथ रहने को मन होता था शादी के बाद वही गले की घण्टी लगने लगी क्यों....शादी के बंधन में जो बंध गए।
ये इंसान की फितरत है जब तक कार उसके पास नहीं उसे कार की ललक है जब गयी थोड़े दिन के बाद वो ललक समाप्त,कहने का तात्पर्य है कोई भी चीज़ तब तक ही लुभाती है जब तक वो हासिल हो,उसमे उत्सुकता बनी रहती है,यही उत्सुकता जब खत्म हो जाती है दिलचस्पी भी खत्म हो जाती है।
इसलिए किसी को किसी भी बंधन में मत बांधिए।उसे आज़ाद रखिये ध्यान रखिये जिस दिन उसे आपने पा लिया सब कुछ खत्म है।
प्रेम को खुले आकाश में उड़ने दीजिये उसकी महक को बिखरने दीजिये , और महसूस कीजिये।
सच्चा सुकूँ आज़ादी में है ना कि बंधन में।