क्या आप अभी भी स्वयं की सुंदरता को निश्चित करने के लिए दर्पण में देखते हैं?

इस मुहावरे से हम सब अवगत हैं

“खूबसूरती देखने वाले की आंखों में होती है”, जिसका अर्थ है, जिसको मैं सुंदर मानता हूं, जरूरी नहीं कि उसे आप भी सुंदर मानें; सौंदर्य को लेकर हमारे दृष्टिकोण वैयक्तिक हैं।

सौंदर्य का मापदंड क्या है?

क्या बाहरी ख़ूबसूरती केवल बाहरी खाल/मांस-मज्जा तक सीमित है, या फिर वह भीतरी का प्रतिबिम्ब है, और ध्यान किस तरह हमारी इस भीतरी सौंदर्य की समझ में सहयोग देता है?

“बाहरी सौंदर्य भीतर की तुलना में किसी और स्त्रोत से आता है। बाहरी सौंदर्य तुम्हारे माता-पिता से आता है: उनके शरीरों से तुम्हारे शरीरों का निर्माण होता है।
लेकिन भीतरी सौंदर्य तुम्हारे स्वयं की चेतना के विकास से आता है जिसे तुम कई जन्मों से लिए हुए हो।

“तुम्हारी निजता में दोनों ही जुड़े हुए हैं, तुम्हारे माता-पिता से मिली हुई शारीरिक विरासत के रूप में या फिर तुम्हारे स्वयं के पिछले जन्मों से, उसकी चेतना से, उसके आनंद और हर्ष से मिली आध्यात्मिक विरासत के रूप में।”

ओशो, सत चित आनंद, टॉक #27


“क्या है वह जो हमसे कहलवाता है कि यह सुंदर है या यह नहीं?


“सुंदरता का माप दंड क्या है?

हम एक फूल के सौंदर्य को मापने के लिए किस माप-दंड का प्रयोग करते हैं?
यह एक बहुत ही कठिन सवाल है।
तुम्हारी इस बात के पीछे फूल को सुंदर कहने का कारण छिपा है वह यह है -
कि क्योंकि तुम उसे ऐसा मानते हो।
लेकिन क्या तुम्हारा ऐसा मानने में तुम्हारा जोर सुंदरता को किसी नियम में बांधने का है?
किसी चीज़ को कुरूप कहने के पीछे क्या आधार है?
यह है क्योंकि तुम ऐसा मानते हो।
लेकिन क्या तुम्हारी नापसंदगी प्रकृति का बनाया हुआ नियम है, कि कोई चीज़ कुरूप है क्योंकि तुम उसे कुरूप मानते हो?
तुम्हारी पसंद या न पसंद क्या दिखाती है?
वह तुम्हारे बारे में सब कुछ बताती है, न कि फूल के बारें में; उसी फूल के पास खड़े होकर मैं भी अपनी पसंद और नापसंद बता सकता हूं।
फूल तो वही रहेगा, चाहे उसे कोई सुंदर कहे या फिर कुरूप; या फिर उसके बारे में कोई भी टिप्पणी नहीं की गई हो, फूल तो फूल ही रहेगा।
हज़ारों लोगों को हज़ारों टिप्पणियां देने दो, फूल वही रहेगा।”

ओशो दि वै ऑफ ताओ, भाग 1, #5

क्या भीतर का सौंदर्य लोगों के बाहरी रूप में अंतर डालेगा?

“तो यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि बाहरी रूप भीतर का दर्पण हो, न तो इसका उल्टा ही सत्य होगा, कि भीतरी का बाहरी से कोई मेल हो।

“लेकिन कई बार यह होता है कि तुम्हारी भीतरी खूबसूरती इतनी ज्यादा होती है, तुम्हारा भीतरी प्रकाश इतना ज्यादा है कि वह तुम्हारे शरीर से प्रकाशित होने लगता है। तुम्हारा बाहरी रूप इतना सुंदर न भी हो, लेकिन जो प्रकाश तुम्हारे स्त्रोत से आता है, तुम्हारी अंतहीन जीवन के स्त्रोत से, वह एक साधारण से दिखने कभी-कभी जो लोग बहुत सुंदर दिखते हैं, अपने आस-पास हमें अच्छे नहीं लगते।

“लेकिन इसके विपरीत यह हमेशा सच नहीं होता। तुम्हारा बाहरी सौंदर्य केवल उथला-उथला होता है। वह तुम्हारे भीतरी सौंदर्य को प्रभावित नहीं कर सकता। इससे उल्टा, बाहरी सौंदर्य भीतरी की खोज में एक बाधा बन जाता है: तुम अपने बाहरी रूप को ही अपना परिचय मानने लगते हो। 
भीतर के स्त्रोत को कौन देखेगा?
 बहुत बार ऐसा होता है कि जो लोग बाहर से देखने पर बहुत सुंदर होते हैं, वे भीतर से बहुत कुरूप होते हैं। उनका बाहरी सौंदर्य स्वयं की असलियत छिपाने की एक आड़ बन जाता है, और यह बात लाखों लोग आए दिन अनुभव करते हैं। तुम किसी पुरुष या स्त्री के प्रेम में पड़ जाते हो क्योंकि तुम उसका बाहरी सौंदर्य ही देख पाते हो। और बस कुछ ही दिनों में जब तुम उसकी भीतरी अवस्था से अवगत हो जाते हो; तुम पाते हो कि वह उसके बाहरी सौंदर्य से मेल नहीं खाता। इसके विपरीत यह बहुत ही कुरूप है।”

ओशो, सत चित आनंद, टॉक #27

क्या हम अपने इन्द्रियों पर ध्यान दिए बिना, जो दिखता है उस पर कुछ ज्यादा ही विश्वास नहीं कर लेते हैं, और अन्य इंद्रियों पर इतना नहीं?

“अपने तत्वज्ञान के पहले ही वाक्य में, अरस्तु कहता है कि दृष्टि मनुष्य की परम इन्द्री है। ऐसा नहीं है। जबकि वास्तव में दृष्टी कुछ ज्यादा ही प्रधान हो गई है। उसने पूरे अस्तित्व पर कब्जा कर लिया है और बाकी सभी इन्द्रियों को नष्ट कर दिया है। उसका गुरु – अरस्तु का गुरु, प्लेटो – कहता है की इन्द्रियों में एक अनुक्रम होता है: दृष्टी जिसमें सबसे ऊपर है और स्पर्श सबसे नीचे। वह बिलकुल गलत है, इनमे कोई भी अनुक्रम नहीं है।

“सभी इन्द्रियां एक ही तल पर होती हैं और उनमें कोई भी अनुक्रम नहीं होना चाहिए।
तुम आंखों द्वारा जीते हो: तुम्हारे जीवन का अस्सी प्रतिशत आंखों से चलता है।
ऐसा नहीं होना चाहिए; एक समतुलता लौटानी होगी।
तुम्हें स्पर्श भी करना होगा क्योंकि स्पर्श में कुछ ऐसा है जो आंखें नहीं दे सकतीं।
लेकिन कोशिश करो: जिस स्त्री को तुम प्रेम करते हो, जिस पुरुष को तुम प्रेम करते हो उसे पहले तेज प्रकाश में स्पर्श करो और फिर उसे अंधकार में स्पर्श करो।
अंधकार में शरीर स्वयं को प्रकट कर देता है, तेज प्रकाश में वह छिप जाता है।”

ओशो, कम फॉलो टू यू, वोल.1, टॉक #1

मैं अक्सर निर्धारित करती हूं कि कोई सुंदर है या नहीं.…

“अगर हम सही से समझें, तो हमें पता होगा कि सभी वाक्य हमे बोलने वाले के बारे में बताते हैं।
अब उदाहरण के तौर पर इस कथन को लें – ‘यह फूल सुंदर है।’ वास्तव में मैं जो बताना चाहता हूं वह यह है कि मैं उस प्रकार का व्यक्ति हूं जिसे फूल सुंदर दिखता है।
अब यह आवश्यक नहीं कि यह फूल सांझ को भी मुझे उतना ही सुंदर लगेगा।
वह मुझे सांझ को कुरूप भी लग सकता है।
तब मुझे कहना होगा, ‘अब मैं एक ऐसा व्यक्ति हूं जिसे यह फूल कुरूप दिख रहा है।’
क्या यह भावनाएं सौंदर्य की हैं या कुरूपता की, वस्तुगत हैं या विषयगत?
क्या ये हमारी निजी और आतंरिक हैं या फिर वस्तुओं का वास्तविक रूप?
वे क्या हैं?
वे हमारे मन की संवेदनाएं और छायाएं हैं।”

ओशो दि वै ऑफ दि ताओ, भाग 1, प्र5

इस आदत को बदलने के लिए मैं क्या करूं?

“अपने मन की छवियों को फूल पर थोपना सही नहीं है।
तुम कौन होते हो यह करने वाले?
तुम्हें हक क्या है?
कोई भी हक नहीं है तुम्हें।
लेकिन हम सब, यह करते हैं।
एक दिन किसी फूल के पास खड़े हो जाओ।
थिर और शांत।
चीज़ों का चुनाव करने की अपनी पुरानी आदत पर ध्यान दो।
अपनी निर्णायक बुद्धि को परे कर दो – एक तरफ फूल को रखो और एक तरफ स्वयं को – फूल की सुंदरता या कुरूपता के प्रति कोई धारणा न लो।”

ओशो दि वै ऑफ ताओ, भाग 1, #5

और ध्यान मेरी समझ को सहयोग देगा.…

“जैसे-जैसे तुम और-और ध्यानमय होते हो, शांत होते हो तब एक घटना घटती है कि तुम अस्तित्व के साथ एक-रूप हो जाते है।
तुम इस ब्रह्माण्ड के साथ लयबद्ध हो जाते हो।
ब्रह्माण्ड के पास भी स्वयं की धड़कन है, एक बार जब तुम्हारे हृदय की धड़कन ब्रह्मांडीय धड़कन के साथ लयबद्ध हो जाए तो वह तुम्हें पशुत्व के कुरूप तल से रूपांतरित करके एक प्रमाणिक मानवता में रूपांतरित कर देगी।

“और मानवता भी अंतिम पड़ाव नहीं है।
तुम गहरे खोज करते रह सकते हो और एक जगह आ जाती है जहां तुम मानवता का भी अतिक्रमण कर जाते हो और कुछ दिव्य तुम्हारे भीतर प्रवेश कर जाता है।
एक बार जब दिव्यता आ जाए, तब ऐसा हो जाता है जैसे किसी अंधेरे घर में प्रकाश जल उठा हो।
उसकी खिड़कियों में तुम्हें प्रकाश दिखने लगेगा; यहां तक कि दीवारों में पड़ी दरारें, या छत और दरवाजे भी तुम्हें भीतरी प्रकाश दिखाने लगेंगे।

“तुम्हारा भीतर बेहद शक्तिशाली है, और बाहरी बहुत ही निर्बल।
भीतरी शाश्वत है, और बाहरी बेहद ही अस्थायी।
तुम कितने वर्ष तक जवान रह सकते हो?
और जैसे-जैसे तुम्हारी जवानी विदा होने लगती है तुम्हें लगने लगता है कि तुम कुरूप हो रहे हो, जब तुम्हारा भीतरी भी तुम्हारी उम्र के साथ बढ़ न रहा हो।
तब तुम्हारी वृद्धावस्था में भी तुम्हारे पास एक सौंदर्य होगा जिससे शायद युवा भी इर्ष्या करने लगे।

ओशो, सत चित आनंद, टॉक #27